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बिल्व का पौधा लगाने से ये मिलता है फायदा 

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नागपंचमी, इस माह पूजा से क्यों भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती है

बिल्व का पौधा लगाने से ये मिलता है फायदा

 

सावन में नागपंचमी का विशेष महत्व होता है, आज शुक्रवार नागपंचमी के विशेष अवसर पर कालसर्प दोष निवारण व अकाल रोग शांति के लिये विशेष पूजन की जाती है।

 

सावन में रोज शिव पूजा करने की परंपरा है। माना जाता है कि इस माह में की गई पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

जो लोग विधिवत पूजा नहीं कर पाते हैं, वह शिवलिंग पर जल और बिल्व पत्र चढ़ाकर भी पूजा कर सकते हैं। ऐसी पूजा से भी अक्षय पुण्य मिलता है। अक्षय पुण्य यानी ऐसा पुण्य, जिसका असर जीवनभर रहता है।

हरियाणा के सिरसा में श्री हनुमान मंदिर महाराजा अग्रसेन स्कूल के सामने बेगू रोड मे अखिल विश्व कल्याण व रोग ग्रह शांति हेतु चल रहें 15 वें महामृत्युंजय रुद्राभिषेक कार्यक्रम चल रहा है।

जिसमें विधिवत मंत्रोचार से शिव पूजन का लाभ प्राप्त कर समस्त जीवों के कल्याण के लिए प्रार्थना की जाती है।

रियाणा के सिरसा में श्री हनुमान मंदिर महाराजा अग्रसेन स्कूल के सामने बेगू रोड मे अखिल विश्व कल्याण व रोग ग्रह शांति हेतु चल रहें 15 वें महामृत्युंजय रुद्राभिषेक कार्यक्रम चल रहा है।

जिसमें विधिवत मंत्रोचार से शिव पूजन का लाभ प्राप्त कर समस्त जीवों के कल्याण के लिए प्रार्थना की जाती है।

सिरसा के ज्योतिषचार्य पंडित नीरज शर्मा ने बताया कि आज शुक्रवार को नागपंचमी है। इसका विशेष महत्व होता है। उन्होंने बताया कि इस सावन माह में शिव पूजा का विशेष महत्व है।

शिव पूजा में बिल्व पत्र जरूर चढ़ाना चाहिए, इसके बिना पूजा अधूरी रहती है।

उन्होंने ये भी बताया कि शिवपुराण में बताया गया है कि बिल्व पत्र को कई दिनों तक बासी नहीं माना जाता है। इसलिए बार-बार बिल्व पत्र को धोकर शिवलिंग पर चढ़ा सकते हैं।

 

 

 

 

बिल्व का पौधा लगाने से ये मिलता है फायदा 

सावन माह में किसी सार्वजनिक जगह पर, या किसी मंदिर में, घर-आंगन में बिल्व का पौधा लगाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि बिल्व के पौधे से घर या कही भी भी आसपास की नकारात्मकता दूर होती है।

इस पेड़ की वजह से वास्तुदोष भी दूर होते हैं। घर में बिल्व का पौधा रहेगा तो शिव पूजा में प्रतिदिन बिल्व की पत्तियां चढ़ाई जा सकती हैं।

पुराणों और धार्मिक कथाओं के अनुसार बिल्ब पत्र जिसे साधारण भाषा में बेल पत्र कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार इसकी उत्पत्ति मां भगवती के पसीने की बूंद से मैकल पर्वत पर हुई थी।

तो वहीं भोलेनाथ को अधिक प्रिय है, यही कारण है भगवान शंकर से जुड़ा कोई भी अनुष्ठान इसके प्रयोग के बिना संपन्न नहीं किया जाता।

खास तौर अगर श्रावण की बात हो तो कहा जाता है कि अगर भोलेनाथ का भक्त इनकी पूजा में इसका इस्तेमाल करना भूल जाता है तो उसे पूजा संपूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाती।

कहने का मतलब है कि सावन व प्रत्येक सोमवार को होने वाली भगवान शंकर की पूजा तथा इनके अनुष्ठान में इसका अधिक महत्व होता है।

आप में से लगभग लोगों ने देखा होगा कि बेल पत्र सामान्य तौर पर तीन पत्तियों वाले होते हैं, लेकिन मंडला जिले की हिरदेनगर की शिव वाटिका में जो बेल पत्र पाए जाते हैं, इन बेल पत्र में 5 से लेकर और 9 पत्तियां तक होती हैं।

हिरदेनगर की शिव वाटिका में है अनूठा पेड़

मंडला जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर लगभग 50 साल पुराना एक ऐसा ही पेड़ है जिसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है।

इस पेड़ के दर्शन करने और इसकी पत्तियों की चाह में शिव भक्त दूर-दूर से यहां आते हैं। वहीं इस पेड़ की सेवा करने वाला परिवार लोगों को इसके महत्व बताने के साथ ही बेल की पत्तियां भी तोड़ कर देता है।

पत्तियों वाला बेल पत्र बीमारियों से राहत दिलवाने में भी है कारगर
बेलबेल की पत्तियों में टैनिन, आयरन, कैलिशयम, पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं। बेल की पत्तियों का चूर्ण पाचन क्रिया को दुरुस्त रखता है।

वहीं गैस होने पर ये तुरंत आराम देता है। जबकि बेल की पत्तियां खाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। बेल के फल शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। जो शीतलता प्रदान करते हैं।

आयुर्वेद चिकित्सा में इसके खास महत्व के चलते अब इसकी खेती भी बहुत से इलाकों में की जाने लगी है।

स्कंद पुराण के अनुसार देवी की ललाट के पसीने की बूंद से उत्पन्न हुए बेल पत्र के पेड़ में महालक्ष्मी का वास माना जाता है।

वहीं वृक्ष की जड़ों में गिरजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी पत्तियों में पार्वती, फूलों में गोरी और फलों में कात्यायनी देवी निवास करती हैं।

भगवान शंकर के त्रिनेत्र और त्रिशूल के साथ ही 3 लोकों के स्वरूप बेलपत्र के 12 दलों वाली पत्तियों को बारह ज्योतिर्लिंगों जैसा महत्व दिया जाता है।

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